निष्पक्ष पत्रकारिता एक धर्मयुद्ध की तरह है जो मजबूत संकल्प के हथियार से लड़ा जाता है । मैने तो अपने कार्य के इस छोटे से कालखंड मैं यही अनुभव किया है । केओंकी मैं बहुत धनी वयक्ति नही था मगर मेरे पास आत्मविश्वास है और वही मेरा हथियार भी । धर्मयुद्ध मैं व्यक्ती हमेशा अकेला ही होता है और उसका साथी सिर्फ़ एक होता है वही शक्ति जो इस संसार को चला रही है । यह मैं नही कह रहा हूँ समय और युगों ने इस बात को हमेशा ही सिद्ध किया है । महाभारत की ही बात ले लीजिये पांडवों के पास क्या था द्रीढ़ संकल्प और भगवान श्री कृषण और उन्होने इतना बड़ा महासमर जीत लिया। यह बातें मुझे अक्सर श्री नीतीश भारद्द्वाज़ जी कहा करते थे जब वे जमशेदपुर के सांसद हुआ करते थे और उनके जमशेदपुर प्रवास पर मैं उनके पास जाया करता था । पता नही क्या कारण था की वो मुझे बहुत स्नेह देते थे । वाकई वो विद्द्वान वयक्ति हैं मैं इस बात को मानता हूँ केओंकी श्रीमद भगवत गीता की अधिकतर बातें मैने उन्ही से सुना और अपने जीवन उतारा जो मेरी सफलता का कारण बना । मेरी पत्रकारिता का उद्देश्य कभी किसी को नुकसान पहुचना नही रहा बल्कि मैने यही चाहा की मैं जिस बुराई को प्रकाश मैं ला रहा हूँ वो खत्म हो जाए और बुराई फेलाने वाले सही रास्ते पर आ जाएँ । कई बार मुझे सफलता मिली। एक घटना का उदाहरण मैं यहाँ दे रहा हूँ :- जादूगोड़ा मैं एक विद्यालय है परमाणु उर्जा केंद्रीय विद्यालय जो यूरेनियम कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड द्वारा संचालित किया जाता है जिसमे केवल कंपनी कर्मचारी और अधिकारी के बच्चे ही पढ़ते हैं। इस स्कूल में सन १९९६ में टयूशन की प्रथा बड़ी जोर शोर से चल रही थी यह सब चलाया जा रहा था तत्कालीन प्राचार्य पुजारी दुबे के वरदहस्त से केओकी शिक्षक बच्चों पर ज़ोर डाल कर जबरदस्ती उनको अपने यहाँ टयूशन पढ़ने के लिए बुलाते थे और मोटी रकम वसूल करते थे कुल कमाई थी २२ लाख रुपए और इसका हिस्सा प्राचार्य महोदय को भी जाता था । कोई था नही जो इस अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठता यहाँ तक की शोषित होने वाले छात्र- छात्राओं के माता पिता भी नही और मैने एक और पंगा ले लिया मैने एक बार टयूशन से सम्बंधित एक समाचार आवाज़ समाचार पत्र में टयूशन प्रकाशीत कर दिया । बस क्या था भूचाल आ गया । केओंकी जादूगोड़ा में दो चिरकूट हैं बिद्या शर्मा और अरुण सिंह ख़ुद को पत्रकार बोलते हैं मगर ज्यादा समय थाना की मुखबीरी और असामाजिक अराज़क तत्वों की चमचागीरी में बीतातें हैं इन लोगों ने शिक्षकों को आश्वस्त कर रखा था की कोई भी अखबार इनके खिलाफ समाचार नही प्रकाशीत करेगा इसके लिए वे शिक्षकों से एक निश्चित रकम लिया करते थे मगर जब समाचार अखबार मैं आ गया तो लाजिमी था की उनके आका नाराज़ हुए । अरुण सिंह को मुझे सबक सिखाने का ज़िम्मा दिया गया और उसने किसी तरह आवाज़ अखबार में नौकरी पकड़ लिया और फिर उसने कई बार मेरे समाचार को रोकने का प्रयास किया मगर कहतें हैं न की सच को दबाया जा नहीं सकता वही हुआ वो जितना मेरी बुराई करता संपादक महोदय मुझे उतना ही प्रोत्साहीत करते अंततः मैने अपने उसे औकात का एहसास करा ही दिया और फिर उसे आवाज़ अखबार ने निकाल दिया । यह मेरी जीत थी . १९९९ में परमाणु उर्जा शिक्षा संस्थान मुंबई के अद्ध्यक्ष किरण दोसी जादूगोड़ा आए और मैने उनसे साक्षात्कार के दौरान सारी बातें भी कही और उन्होने तत्काल टयूशन को प्रतिबंधित कर दिया । सामाजिक बुराई के खिलाफ यह मेरी सबसे बड़ी जीत थी । मेरे विरोधिओं ने भी मेरी तारीफ किया ।इस वाकये मैं मजे की बात यह हुई जब में श्री दोसी का साक्षातकार ले रहा था तो विद्या शर्मा को बाहर रोक कर रखा गया था मगर बाद मैं वो किसी तरह अन्दर आ गया और बेतुका सा सवाल कर डाला की " सुना है की आप इंग्लिश को बहुत बढावा दे रहें हैं " श्री दोसी ने उसे देखा और कहा आपका सवाल अधुरा और बेकार है आप जा सकतें हैं । श्री दोसी ने कई सालों तक राजदूत के तौर पर बाहर के देशों में भारत का प्रतिनीधित्व किया था और उनका मिलना और बातें करना किसी के लिए भी बड़ी बात थी। खैर तिलमिला कर विद्या शर्मा बाहर निकले और अपने आकाओं से कहा की दोसी साहब ने आशीष को बहुत डाटा है । सब खुश हुए मैं बाहर आया तो मुझसे व्यंग कर के पूछते हैं की "क्या हुआ भाई मज़ा आया" मैने उनको टेप सुना दिया जो मैने रिकॉर्ड किया था और बोला की वाकई मज़ा आया मैने ज़ंग जीत लिया, अब आपलोग भी सुधर जाएँ . मैं आभारी हूँ दोसी साहब का की उन्होने वास्तविकता को समझा और इस सामाजिक बुराई का अंत किया । इस तरह मजबूरी मैं ही सही सभी भ्रष्टलोग रास्ते पर भी आए और बुरे का अंत भी हुआ हाँ इस दौरानमुझे कई प्रलोभन भी दिए गए मगर मैने जो ठान लिया वो कर के छोडा
शुक्रवार, 20 मार्च 2009
गुरुवार, 19 मार्च 2009
निष्पक्ष पत्रकारिता कुर्बानी मांगती है . .
यह पत्रकारिता जीवन मुझे कई अनुभव दे गया और मैने इस छोटी सी उम्र में यह अनुभव किया की निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए कुर्बानी देनी पड़ती है । कई बार ऐसे मौके आए मगर मैं पीछे नही हटा हर चुनौती से टकराता रहा । हाँ इसके लिए मुझे बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी । मगर मुझे उसका कोई ग़म नही है । जादूगोड़ा में यू सी आई एल कारखाना है यहाँ यूरेनियम की खदान है और यहाँ पर करीब चार हज़ार मजदूर काम करतें हैं । उन्ही में से कुछ लोग अवैध रूप से ब्याज पर रुपया देने का भी काम करते है इसके लिए वो जिस भी मजदूर को रूपया देतें हैं उनका बैंक का पासबुक और चेक बुक बंधक रख लेतें हैं और मनमाना बयाज वसूल करतें हैं तब तक जब तक की क़र्ज़दार कंगाल नही हो जाता । यह किसी एक वयक्ति की नही वरन एक सामाजिक समस्या थी मुझे यह ग़लत लगा और मैने तत्कालीन थाना प्रभारी से इस पर अंकुश लगाने के लिए कहा मगर कोई असर नही हुआ । तब मेरी समझ में आया की समाज में कोई भी अपराध खुले तौर पर बिना किसी दूसरी शक्ति के वरदहस्त के नही हो सकता है मतलब अपनी पाप की इस कमाई का एक बड़ा हिस्सा यह सूदखोर माफिया पुलिस को भी दिया करते थे । मगर मैं भी अड़ गया और मैंने पीड़ित वयक्ति का बयान ले कर सबूत के साथ अखबार में प्रकाशित कर दिया । घटना यूँ थी की उस आदमी ने एक सूदखोर माफिया से ब्याज पर एक लाख रुपये लिया था और एक साल के अन्दर कुल एक लाख पचास हज़ार देने के बाद भी वो एक लाख रुपये का देनदार था । जब अखबार में समाचार आया तब मजबूरन उस थानेदार को उस सूदखोर माफिया पर कारवाई करनी पड़ी और उस सूदखोर माफिया को जेल भी जाना पड़ा करीब ४० लोगों को जो उसके शिकार थे उसके पंजों से निजात मिली । अखबार रिश्वत पर भारी पड़ गया । लाजिमी है की मैं उस थानेदार का परम शत्रु बन गया और इसका बदला उसने मुझ पर ४०७ बस चढ़वा कर ले लिया । बात४/०९/२००० की है में अपने घर के बाहर खड़ा था की तभी एक ४०७ बस ने मुझे धक्का मार दिया मैं संभल पाता तब तक बस मेरे दोनों टांगों पर चढ़ चुकी थी । ड्राईवर ने ऐसा दो बार किया मैं हतप्रभ था मगर आश्वस्त भी की मेरा बुरा नही हो सकता मेरा शुरू से परम शक्ति पर अटूट विश्वास रहा है और उसी पर विश्वास करके मैं जब खड़ा हुआ तो पाया की टांग टूट चुकी है । चालक को पब्लिक ने पकड़ कर पीटा मगर मेरे पिताजी ने उसे मार से बचा कर पुलिसके हवाले कर दिया । थानेदार को मौका मिल गया और उसने मेरे छोटे भाई को जो दसवीं का विद्यार्थी था को ड्राईवरको मारने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया । मगर उसी दिन उसकी कोर्ट से उसकी जमानत हो गयी । थानेदार कोलगा की अब मेरे पत्रकारिता जीवन का अंत हो गया मगर वो उसकी भूल थी और मेरी सिर्फ़ दायीं टांग की हल्की सी हड्डी टूटी थी मैं ४५ दिनों में बिल्कुल ठीक हो गया । बाद में मुझे पता चला की वो घटना उस थानेदार की ही करतूत थी । और इसके बाद उस मैने उस थानेदार को ऐसा सबक सिखाया की आज तक वो मुझे भूल नही पाया है । इसके लिए मैं झारखण्ड के तत्कालीन पुलिस महानीदेशकों श्री टी पी सिन्हा और आर आर प्रसाद जी को बहुत धन्यवाद देता हूँ , साथ ही धन्यवाद देता हूं , मेरे मित्रों श्री चंद्रभूषण शर्मा और दीनानाथ त्रिपाठी को जन्होने मुसीबत की उस घड़ी में मेरा साथ निभाया और लोगों को यह एहसास कराया की मैं इस धर्मयूद्ध मैं अकेला नही हूँ ।
मंगलवार, 17 मार्च 2009
मेरा पत्रकारीता जीवन 2
उसके बाद मेरा सफर अनवरत जारी है अभी मैं साधना न्यूज़ चैनल मैं संवाददाता हूँ । अपने सहारा समय के छोटे से कार्यकाल मैं मैने शांतनु चक्रवर्ती जैसे लोगों को भी देखा यह वो वयक्ति है जिसने मुझे समाचार बनाने की कला सिखाया । नानक सिंह ने मुझे कैमरा की बारीकीओं से अवगत कराया , हाँ जीतेन्द्र प्रसाद सहायक कैमरामेन था काम नही जानता था मगर निर्देश खूब दिया करता था हर रिपोर्टर उससे परेशान रहता था ख़ास कर उसे इस बात की खूब चिंता रहती थी की कोई रिपोर्टर अगर अच्छा काम कर लेगा तो उसका अस्तित्व खतरे मैं आ जायगा । ब्यूरो प्रमुख प्रीति जी थी मगर निर्देश वो दिया करता था । यही प्रीति जी की कमजोरी थी जो बाद में उनके पतन का कारण बनी । मेरा प्रीति जी से १२ साल पहले के रिश्ते थे जब हमलोग एक चिकित्सा पद्धति की क्लास किया करते थे मगर इन चिरकुटों की वजह से उन्हें भी अपना वजूद खतरे में नज़र आने लगा और मैं सभी रिपोरटर जो अच्छा काम कर रहे थे उनकी शामत आ गयी । मैने हमेशा प्रीति जी को बड़ी बहन की तरह सम्मान दिया उन्होने भी मुझे छोटे भाई की तरह स्नेह दिया बस इसीलिए मुझे इस बात का हमेशा बहुत दुःख रहेगा की मेरा उनसे रिश्ता कुछ ऐसे लोगों की वजह से टुटा जो कभी उनके थे ही नही उनके क्या कभी किसी के नही हो सकते । आज भी मैं उनका उतना ही सम्मान करता हूँ और करता रहूँगा मगर साथ ही एक आग्रह भी की पर्सनल रिलेशन कभी किसी भी वजह से प्रोफशनल रिलेशन नही बन सकते और कभी बनाने भी नही चाहीये । इसलिये दीदी कभी फिर से नही किसी के साथ भी .........................नही
सोमवार, 16 मार्च 2009
मेरा पत्रकारीता जीवन 1
२००४ वो समय था जब सहारा समय चैनल का बिहार - झारखण्ड में उदय हो रहा था और करने के लिए सभी के पास बहुत कुछ था । मैंने १४ दिसम्बर २००४ को इस चैनल को ज्वाइन कीया था । यहाँ मैं एक नाम का उल्लेख करना नही भूल सकता मेरे दोस्त भोला तमारिया का यह वो शख्स है जिससे मैने इलेक्ट्रोनीक मीडिया की बारीकियाँ सीखा । हाँ तो १८ तारीख को मैं और भोला जमशेदपुर के मंगलम रेस्टुरेंट मैं बैठे काफी पी रहे थे अचानक मेरे मन मैं एक बात आयी की यार चलो झारखण्ड स्टेट के बारे मैं इन्टरनेट से जानते हैं । बस चल पडे कैफे की और साईट लॉग इन किया और देख कर दंग रह गये की झारखण्ड स्टेट डॉट कॉम के नाम से पॉर्न साईट चलायी जा रही थी । शूट किया और निकल पडे ख़बर को ब्रैक करने । ऑफिस पहुँचा और प्रीती जी को पुरी ख़बर बताई उन्होने शाबाशी दी और ख़बर चैनल पर चलवा दिया यह राष्ट्रिय स्तर की बड़ी ख़बर थी ख़ुद नॉएडा से सुनंदा दीक्षीत जी ने मुझे फोन पर शाबाशी दी. बडे यादगार पल थे वो । फिर मेरी लाइव रिपोर्टिंग हुई नीरद निश्चल जी एंकर थे ।
मैं खुश था की मेरा बचपन का सपना पुरा हुआ था । मैं झारखण्ड के सिंहभूम जिले के पिछडे क्षेत्र जादूगोड़ा का रहने वाला हूँ मैने अपने लगन और परीश्रम से यह सिद्ध कर दिया था की मेहनत और ईमानादारी से कुछ भी करना मुश्किल नही है। हाँ इस कामयाबी से जहाँ मेरे मित्र खुश हुए वही विरोधी भी बनते गए । परवाह नही है अच्छा करने की ललक थी है और रहेगी । चैनल मैं एक रिपोर्टर है सुदामा राय मुझे वह व्यक्ति मानसिक अवसाद से ग्रस्त लगता है कयोंकि जब भी मैंने कुछ अच्छा किया उसे खूब जलन हुई ख़ुद कुछ बोलने किया हिम्मत नही थी सो प्रीती जी के कान भरता रहता था उसकी यह आदत अभी तक नही छुटी और यही कारण है की प्रतिभा संपन्न होते हुए भी पत्रकारिता में वह अभी भी अपने वजूद के लिया ज़मीन तलाश रहा है । चीरकुटों की कमी नही है जहाँ भी जाता हूँ एक दो सुदामा रॉय मिल ही जातें हैं । मगर में ऐसे लोगों का धन्यवाद भी करता कयोंकी यही ऐसे लोग हैं जिनकी आलोचना,मुझे अच्छा करके आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं । रविवार, 15 मार्च 2009
पत्रकारिता एक अभियान है
मेरे पत्रकारिता जीवन की शुरुआत
अपने पत्रकारीता जीवन की शुरुआत मैने सन १९९६ इसवी मैं आवाज़ हिन्दी दैनिक से जमशेदपुर में कीया था जब मैं दसवीं का छात्र था । मेरे पापा भी एक पत्रकार थे बस उन्ही की प्रेरणा से मेरे मन मैं भी पत्रकार बनने की ललक जाग उठी । मैने जब आवाज़ ज्वाइन कीया तो श्री श्याम किशोर चौबे मेरे पहले संपादक थे जिन्होने मुझे प्रोत्साहित किया और सही रास्ता दिखाया जिस पर चल कर मैं एक सफल पत्रकार बन सका । मैं इसके लिए आजीवन उनका ऋणी रहूँगा । मेरे इस सफलता मैं एक और नाम भी है जो बहुत ख़ास है डॉक्टर रामचंद्र पाठक का जो मेरे हाई स्कूल के हिन्दी के शिक्षक थे और मैं उन्हें अपना गुरु भी मानता हूँ केओकी हिन्दी भाषा मैं प्रवीणता मैने उन्ही से सीखा जो आगे चल कर मेरी सफलता की कुंजी बना । १९९८ में जब आवाज़ अख़बार जमशेदपुर से बंद हुआ तब मैने रांची से झारखण्ड जागरण ज्वाइन कर लिया उसके बाद सन २००० मैं मैने श्री कृषनेन्दु घोष जी के सहयोग से इलेक्ट्रोनीक पत्रकारिता मैं कदम रखा और जमशेदपुर से चलने वाले विडियो न्यूज़ पत्रिका न्यूज़ टाईम्स से जुड़ गया ।
सही कहूं तो यही पत्रिका मेरे इलेक्ट्रोनीक मीडीया की पाठशाला रही जहाँ मैने काम सीखा । २००४ में मैने प्रीती मिश्रा जी के सहयोग से सहारा समय चैनल ज्वाइन कर लीया।
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